जनता त्रस्त अधिकारी मस्त ओवरलोड ट्रक तोड़ रहे सड़क
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत वर्षों से लंबित लार रोड के समीप बढ़या हरदों से रेवली, नेमा होते हुए तकिया धरहरा तक सड़क निर्माण कार्य शुरू होने से ग्रामीणों में खुशी की लहर थी। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई। सड़क अभी पूरी तरह बनी भी नहीं थी कि जिस हिस्से का निर्माण हो चुका है, वह भी जगह-जगह टूटकर गड्ढों में बदलने लगी है। इसका मुख्य कारण है – बालू से लदे ओवरलोड ट्रकों का लगातार आवागमन।
निर्माणाधीन सड़क पर भारी वाहनों का दबाव
ग्रामीणों के अनुसार रोजाना 80 से 90 टन तक बालू से लदे ट्रक इस मार्ग से गुजरते हैं। यह ट्रक बालू ठेकेदारों द्वारा निकासी व ढुलाई के लिए भेजे जाते हैं। भारी वाहनों का दबाव नई बनी सड़क झेल नहीं पा रही और परत उखड़कर गड्ढे बनते जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़क कुछ ही महीनों में पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी।
लगातार शिकायतें लेकिन कार्रवाई नदारद
नेमा गांव के शिक्षक व बीडीसी सदस्य देवेंद्र कुमार सिंह, गिरीश सिंह सहित कई ग्रामीणों ने सड़क पर चल रहे ओवरलोड ट्रकों की शिकायत 3 जुलाई को जिलाधिकारी देवरिया से की थी। इसके बाद 31 जुलाई और 29 अगस्त को मामले को जनपद के प्रभारी मंत्री एवं प्रदेश सरकार के परिवहन राज्य मंत्री दयाशंकर सिंह तक पहुंचाया गया।
मंत्री ने संज्ञान लेते हुए संभागीय परिवहन अधिकारी गोरखपुर को जनपद स्तरीय समिति गठित कर जांच के निर्देश दिए। वहीं जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने एडीएम वित्त एवं राजस्व को मामले की जांच कर कार्रवाई सुनिश्चित करने का आदेश दिया।
आदेशों के बाद भी ओवरलोडिंग जारी
जिलाधिकारी और मंत्री के निर्देशों के बावजूद परिवहन विभाग, खनन अधिकारी व अन्य जिम्मेदार विभागीय अधिकारी ओवरलोड ट्रकों पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित अधिकारी केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित हैं और जमीनी स्तर पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा रहा है।
जनता में बढ़ता आक्रोश
ग्रामीणों का कहना है कि जब शासन और प्रशासन स्तर से आदेश दिए जा चुके हैं, फिर भी कार्रवाई न होना अधिकारियों की लापरवाही को दर्शाता है। इससे न सिर्फ सरकारी धन बर्बाद हो रहा है बल्कि आमजन को भी खस्ताहाल सड़क पर चलने को मजबूर होना पड़ रहा है।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही ओवरलोड ट्रकों का आवागमन नहीं रोका गया तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
प्रश्न यह है कि जब शासन-प्रशासन की ओर से स्पष्ट निर्देश दिए जा चुके हैं, तो आखिर कौन-सी मजबूरी है कि विभागीय अधिकारी कार्रवाई से बच रहे हैं? क्या सड़क बनने से पहले ही टूटती रहेगी और ग्रामीणों की आवाज यूं ही अनसुनी की जाती रहेगी?