शताब्दी की यात्रा : संघ का सौ साल और नया भारत का संकल्प
शताब्दी की यात्रा : संघ का सौ साल और नया भारत का संकल्प
नागपुर/नई दिल्ली।
27 सितंबर 1925 को डॉ. हेडगेवार ने नागपुर में एक बीज बोया था— राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बीज। यह बीज आज शताब्दी का वटवृक्ष बन चुका है। शाखाओं में बजती प्रार्थना की गूंज से लेकर सेवा कार्यों तक, समाज की हर परत में संघ की छाप देखी जा सकती है। और अब, ठीक सौ वर्ष बाद, संघ एक बार फिर इतिहास रचने जा रहा है।
आरएसएस अपने स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर देशभर में 3 दिवसीय भव्य कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। 27 से 29 सितंबर तक चलने वाले इन आयोजनों की धड़कन नागपुर होगी, जहां संघ की जड़ें हैं। इस अवसर पर देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे।
नागपुर बनेगा केंद्र
संघ मुख्यालय पर शताब्दी वर्ष की शुरुआत विशाल पथ संचलन, प्रदर्शनी और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से होगी। नागपुर की गलियां उस दिन भगवा ध्वज और राष्ट्रध्वज के रंग में रंगी होंगी। रामनाथ कोविंद का संबोधन इस शताब्दी को भविष्य की दिशा देने वाला माना जा रहा है।
देशभर में उमड़ेगा उत्सव
सिर्फ नागपुर ही नहीं, बल्कि हर राज्य, हर शहर और हर गांव इस उत्सव में सहभागी होगा।
उत्तर प्रदेश में अयोध्या, वाराणसी और लखनऊ से लेकर गांव-गांव में पथ संचलन और सेवा शिविर।
दिल्ली में प्रबुद्धजनों की गोष्ठियां और इंडिया गेट पर सांस्कृतिक झांकी।
मध्य प्रदेश के उज्जैन और भोपाल में धर्म-संसद और महाकालेश्वर में विशेष रुद्राभिषेक।
गुजरात के सोमनाथ से लेकर तमिलनाडु और केरल तक, समुद्र से हिमालय तक भारत इस उत्सव का गवाह बनेगा
सेवा, संस्कृति और समरसता
संघ के सौ वर्षों की यात्रा केवल शाखाओं की गिनती नहीं है। यह यात्रा सेवा भारती के अस्पतालों में दिखती है, यह यात्रा विद्यार्थी परिषद के आंदोलनों में झलकती है, यह यात्रा आपदा के समय मदद करने वाले स्वयंसेवकों में प्रकट होती है।
आज जब समाज जाति-पांति के बंधनों से जूझ रहा है, तब संघ का संदेश स्पष्ट है— “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास।”
रामनाथ कोविंद की मौजूदगी
शताब्दी समारोह में रामनाथ कोविंद की मौजूदगी एक संदेश है। वे उस समाज से आते हैं जिसे लंबे समय तक उपेक्षित माना गया। उनका मंच पर होना संघ की समरसता दृष्टि का प्रतीक माना जा रहा है।
भविष्य की ओर दृष्टि
संघ का यह शताब्दी उत्सव केवल बीते हुए 100 वर्षों का स्मरण नहीं है, बल्कि आने वाले 100 वर्षों का संकल्प भी है। एक ऐसा भारत जो आत्मनिर्भर हो, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हो, और दुनिया के सामने विश्वगुरु के रूप में खड़ा हो।
यह शताब्दी केवल संघ परिवार का पर्व नहीं है। यह भारत की उस यात्रा का पर्व है जिसमें समाज का हर वर्ग, हर व्यक्ति, हर विचारधारा किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है।
यह केवल इतिहास नहीं, भविष्य की भूमिका भी है।