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राजनीति: सेवा या मेवा खाने का ठेका?

राजनीति: सेवा या मेवा खाने का ठेका?

लोकतंत्र का मूल मंत्र सेवा है, लेकिन आज नेताओं के आचरण को देखकर यही कहना पड़ता है कि सेवा अब सिर्फ दिखावा है और असली खेल मेवा खाने का है। राजनीति जिसे कभी त्याग और आदर्श का प्रतीक माना जाता था, आज व्यक्तिगत लाभ, भ्रष्टाचार और अवसरवाद की मंडी बन चुकी है।

पहले नेताओं पर आरोप लगते ही वे पद छोड़कर जांच का सामना करते थे। इससे जनता का विश्वास भी बना रहता था। लेकिन अब नेता जेल की सलाखों के पीछे जाने के बाद भी कुर्सी से चिपके रहते हैं। यह न केवल लोकतंत्र की मर्यादा का अपमान है, बल्कि जनता के विश्वास के साथ खुला धोखा भी है।

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—दोनों ही जनता की सेवा से ज्यादा सत्ता के गणित में उलझे दिखाई देते हैं। यही कारण है कि संसद में संवैधानिक संशोधन विधेयक लाना पड़ा, जिसमें तय किया गया है कि जेल जाने वाला कोई भी नेता संवैधानिक पद पर नहीं रह सकेगा। यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन इसे सख्ती से लागू करना और जनता की राजनीतिक चेतना जगाना सबसे जरूरी है।

लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब जनता अपने वोट को हथियार की तरह इस्तेमाल करेगी। यदि जनता जाति, धर्म और लालच से ऊपर उठकर सचमुच ईमानदार नेताओं का चुनाव करेगी तभी राजनीति फिर से सेवा का पर्याय बन पाएगी। वरना मेवा खाने वाले नेताओं की राजनीति देश को खोखला करती रहेगी।

कटाक्ष बॉक्स

“सेवा का नारा, मेवा का कारोबार—यही है आज की राजनीति का असली चेहरा!”

“जेल की सलाखों से भी कुर्सी से चिपके रहना—क्या यही है लोकतंत्र की नई परिभाषा?”

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“नेता बदलेंगे या जनता? चुनाव का फैसला मतदाता के हाथ में है!”

“लोकतंत्र को बचाना है तो वोट को जाति-धर्म से ऊपर उठकर देशहित में डालना होगा!”

“सत्ता का उद्देश्य सेवा हो, न कि सिर्फ़ लाभ उठाना—वरना राजनीति फिर केवल मेवा खाने का ठेका रह जाएगी!”

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