ग्राम पंचायत सचिव की मनमानी पर डीडीओ सख्त – ठप पड़े विकास कार्य, ग्रामीण परेशान
ग्रामीण न्यूज तेज नजर देवरिया
देवरिया जनपद के रामपुर कारखाना ब्लॉक की सामी पट्टी ग्राम पंचायत इन दिनों एक अदद ग्राम पंचायत सचिव की मनमानी का शिकार है। तबादला होने के सवा महीने बाद भी सचिव रामदयाल ने नए सचिव को चार्ज नहीं सौंपा, जिसके चलते गांव के विकास कार्य पूरी तरह ठप हो गए हैं। यह प्रकरण न केवल पंचायती राज विभाग की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि ग्रामीणों की समस्याओं को भी और बढ़ा रहा है।
तबादला हुआ, लेकिन चार्ज नहीं
18 जुलाई 2025 को पंचायती राज विभाग ने आदेश जारी कर सामी पट्टी के सचिव रामदयाल का तबादला कर दिया था। उनकी जगह दिलीप कुमार भारती को नए ग्राम पंचायत सचिव के रूप में नियुक्त किया गया। लेकिन आदेश के बावजूद आज तक नए सचिव को कार्यभार नहीं सौंपा गया। सवाल यह उठता है कि क्या सचिव को अपने ऊँचे संबंधों पर इतना भरोसा है कि वह खुलेआम ट्रांसफर आदेश की अवहेलना कर रहे हैं?
ठप पड़े विकास कार्य
चार्ज न मिलने की वजह से गांव में कोई भी फाइल आगे नहीं बढ़ रही है। न तो विकास योजनाओं की प्रक्रिया चल पा रही है और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर मिल पा रहा है। पंचायत भवन से लेकर मनरेगा तक के काम ठप पड़े हैं। इससे ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है।
गांव के ही एक बुजुर्ग किसान ने कहा – “हमारे गांव में काम जैसे थम गया है। सचिव जी अपना ट्रांसफर होने के बाद भी यहां जमे हुए हैं। अधिकारी भी चुप हैं। इसका नुकसान हमें उठाना पड़ रहा है।”
डीडीओ आए एक्शन मोड में
मामला जब जिला विकास अधिकारी (डीडीओ) सुशील कुमार सिंह के संज्ञान में आया तो उन्होंने सख्ती दिखाई। डीडीओ ने जिला पंचायत राज अधिकारी को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब देखना यह है कि विभाग इस मनमानी पर कब और कितना बड़ा कदम उठाता है।
जिलाधिकारी का रुख
इस पूरे प्रकरण पर जिलाधिकारी दिव्या मित्तल का कहना है कि अभी तक यह मामला उनके संज्ञान में नहीं आया है। लेकिन यदि सचिव ने ट्रांसफर के बावजूद चार्ज नहीं दिया है तो यह गंभीर मामला है। इसकी जांच कराकर दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
बड़ा सवाल – संरक्षण किसका?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सचिव रामदयाल किसके संरक्षण में ट्रांसफर आदेश को नजरअंदाज कर रहे हैं। पंचायती राज विभाग में लंबे समय से यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि कई कर्मचारी मनपसंद जगह पर जमे रहना चाहते हैं और इसके लिए आदेशों की धज्जियां उड़ाने में भी पीछे नहीं हटते।
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निचोड़
यह मामला सिर्फ एक ग्राम पंचायत सचिव की मनमानी भर नहीं है, बल्कि उस तंत्र की पोल खोलता है जहां अधिकारी और कर्मचारी मिलकर व्यवस्था को पंगु बना देते हैं। सवाल यह है कि जब आदेश का पालन ही न हो तो फिर ट्रांसफर करने का औचित्य क्या है? ग्रामीणों को राहत कब मिलेगी – यही अब सबसे बड़ा मुद्दा है।