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शिकायतकर्ताओं द्वारा मानवाधिकार संगठनों एवं उच्चाधिकारियों के यहां लगाई गई गुहार की सुनवाई में आखिर इतना विलंब क्यों ।

शिकायतकर्ताओं द्वारा मानवाधिकार संगठनों एवं उच्चाधिकारियों के यहां लगाई गई गुहार की सुनवाई में आखिर इतना विलंब क्यों ।

 

वैसे तो इंसाफ़ के लिए लड़ने वालो कि संख्या कम हैं क्योंकि जब वह अपने लिए इंसाफ मांगना चाहता हैं तो उसको दर दर की ठोकरे खाने को मजबूर हो जाता हैं अगर कुछ इंसाफ़ मिल भी गया तो इतना समय उसका बर्बाद हो जाता हैं कि वह ना घर का ना बहार का रह पाता हैं उसकी जिंदगी भर की कमाई कोर्ट कचेरी व उसका समय इंसाफ़ पाने के लिए बीत जाता है तो कुछ को कभी इंसाफ आखरी सांस तक नही मिल पाता लेकिन कुछ सवाल भी हैं।जब कभी भी किसी पीड़ित या मजलूम पर कोई आफत आती है या मुसीबत होती है तो वह उच्च अधिकारी व मानवाधिकार संगठनों की तरफ दौड़ता है तथा अपनी शिकायत लिखित रूप में भेजता है जब कभी भी पीड़ित द्वारा ऐसे प्रार्थना पत्र उच्च स्तर पर भेजे जाते हैं तो उसे बड़ी उम्मीद होती है कि उसे न्याय मिलेगा।लेकिन उस न्याय की आस में उसकी आस और हिम्मत तब टूट जाती है जब ऊपर से कोई भी राहत तत्कालिक रूप से नहीं मिल पाती अक्सर ऐसा होता है कि पीड़ित बहुत जल्दबाजी में और मुसीबत से घिरा होने के बाद उच्चअधिकारियों को फैक्स एवं ईमेल तथा डाक के माध्यम से अपनी शिकायत भेजता है तथा अपनी गुहार लगाता है।लेकिन बहुत लंबा समय हो जाने के बाद भी ऊपर से कोई राहत नहीं मिल पाती और जब मिलती है तो पीड़ित बहुत कुछ अच्छा बुरा सहन कर चुका होता है।अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि जब उसकी जांच आती है तो तब तक महीनों लग जाते हैं तथा उस मामले में उसके पास कुछ भी नहीं रह जाता ओर फिर तो संबंधित अधिकारियों को बयान देकर ही इतिश्री करनी पड़ती है।बेहतर हो कि ऐसे मामलो में ऐसी शिकायतों को बहुत ही गंभीरता पूर्वक लिया जाए तथा जल्द से जल्द उन पर सुनवाई हो क्योंकि पीड़ित बहुत ही उम्मीदों से अपनी गुहार ऊपर तक लगाता है और उसे उम्मीद होती है कि उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा तो वही ज्यादातर पुलिस से संबंधित शिकायतते होती है।जिनकी ज्यादातर जांच जिले के पुलिस अधिकारियों के पास ही आती हैं इनमें आरोपी पुलिस वाले अपने अधिकारियों के यहां पीड़ित को किसी ना किसी प्रकार से दबाव में लेने की कोशिस करते हैं और प्रयास होता हैं।कि अधिकारियों से अपने मन माफ़िक बयान कराकर रफा दफा करा दें अगर सूत्रों की माने तो कई शिकायतों में भी देखा गया है कि शिकायतकर्ता के बयान के नाम पर स्थानीय स्तर पर बयान लेने वाले पुलिस जन धन की भी मांग कर लेते हैं यह बहुत ही शोचनीय विषय है इस संदर्भ में उच्च अधिकारियों को चाहिए कि वह पीड़ित के बयान लेने की प्रक्रिया को बहुत ही सरल व आसान बनाएं।तथा पुलिस से जुड़े शिकायती मामलों को प्रशासनिक मामलों से या अन्य जांच एजेंसी से कराएं शिकायत करता को अपनी बात कहने का पूरा अवसर मिल सके जिससे पीड़ित शिकायतकरता को इंसाफ व कानुन व्यवस्था पर विश्वास कायम रहें।

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