बिहार प्रांत से शुरू होकर पूरे देश सहित विदेशों में भी प्रचलित होता जा रहा है छठ महापर्व
बिहार प्रांत से शुरू होकर पूरे देश सहित विदेशों में भी प्रचलित होता जा रहा छठ महापर्व
रियासत अली
छठ पूजा अब पूरे देश में विशाल पूजा का रूप धारण कर लिया है बिहार प्रांत से शुरू होकर पूरे देश सहित विदेशों में भी प्रचलित होता जा रहा है। दीपावली के बाद छठ की धूम शुरू हो जाती है शहर से लेकर गांव तक लोगों में हर्ष का माहौल बना रहता है छठ पूजा की तैयारी रतनपुरा, रोपन छपरा व पारसी चलाल ग्राम प्रधानों ने एक दिन पूर्व से ही घाट का साफ सफाई का कार्य शुरू कर दिया था जगह-जगह छठ घाट पर प्रशासन के प्रशासन के लोगों द्वारा छठ घाटों का जायजा लिया गया ताकि छठी ब्रता के लिए किसी प्रकार की कोई परेशानी ना हो सभी लोग अपनी त्योहार सुचारू रूप से मनाया जा सके।

कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिंदू पर्व है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार ,झारखंड , पश्चिम बंगाल , पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। कहा जाता है यह पर्व मैथिल ,गहमी और भोजपुरी लोगों का सबसे बड़ा पर्व है । यह उनकी संस्कृति है। छठ पर्व बिहार में बड़े धूम – धाम से मनाया जाता है। यह पर्व बिहार या पूरे भारत का ऐसा एक मात्र पर्व है जो वैदिक काल से चला आ रहा है और अब तो यह बिहार कि संस्कृति बन चुका है। यह पर्व बिहार के वैदिक आर्य संस्कृति की एक छोटी सी झलक दिखाता हैं। यह पर्व ऋग्वेद में वर्णित सूर्य पूजन एवं उषा पूजन तथाआर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता हैं।

बिहार मे हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाले इस पर्व को गैर हिन्दू सहित अन्य धर्मावलम्बी भी मनाते देखे जाते हैं। धीरे-धीरे यह त्योहार प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है। छठ पूजा सूर्य, प्रकृति,जल, वायु और उनकी बहन छठी मइया को समर्पित है। छठी मैया, जिसे मिथिला में रनबे माया भी कहा जाता है, भोजपुरी में सबिता माई और बंगाली में रनबे ठाकुर बुलाया जाता है। पार्वती का छठा रूप भगवान सूर्य की बहन छठी मैया को त्योहार की देवी के रूप में पूजा जाता है। यह चंद्र के छठे दिन काली पूजा के छह दिन बाद छठ मनाया जाता है। मिथिला में छठ के दौरान मैथिल महिलाएं, मिथिला की शुद्ध पारंपरिक संस्कृति को दर्शाने के लिए बिना सिलाई के शुद्ध सूती धोती पहनती।

छठ पर्व का शुरुआत –
छठ पर्व को लेकर धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं भी हैं कि रामायण काल में मुंगेर की गंगा नदी के तट पर मां सीता ने पहली बार छठ व्रत किया था. इसके बाद से छठ व्रत मनाया जाने लगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां सीता ने सबसे पहले मुंगेर में उत्तरवाहिनी गंगा घाट पर छठ व्रत किया था, जिस स्थान पर मां सीता ने छठ पूजा की थी एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में रनबे (छठी मैया) अपनी पुत्री की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले महादानी सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी। कर्ण बिहार के अंग प्रदेश (वर्तमान भागलपुर) के राजा थे और सूर्य और कुंती के पुत्र थे। सूर्यदेव से ही कर्ण को दिव्य कवच और कुंडल प्राप्त हुए थे, जो हर समय कर्ण की रक्षा करते थे।