सिर्फ नारों और विज्ञापनों से समाज की सोच नहीं बदल सकती,दोषियों को सजा दिलाकर बेटियों का मनोबल बढ़ाएं
सिर्फ नारों और विज्ञापनों से समाज की सोच नहीं बदल सकती,दोषियों को सजा दिलाकर बेटियों का मनोबल बढ़ाएं
देखने मे आ रहा हैं कि महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं!लड़कियों को अधिकतर अधिकार बहुत संघर्ष के बाद ही मिल पाए हैं पर अब भी उन्हें समाज में सुरक्षा का अधिकार नहीं मिल पाया है!आए दिन सड़कों, ट्रेनों, बसों, घरों, स्कूलों,कॉलेज, दफ्तरों व गली महोल्लो में लड़कियां वह सब झेलने को मजबूर होती हैं जो संवैधानिक दृष्टि से अनैतिक और गैरकानूनी है पर समाज में खुलेआम प्रतिदिन होता है! मानो उन्हें सामाजिक वैधता प्राप्त हो!अश्लील फब्तियां, छेड़छाड़,गलत तरीके से छूना, दुर्व्यवहार,शारीरिक और मानसिक हिंसा, बलात्कार आदि! लड़कियां ऐसी प्रताड़नाओं का रोज सामना करती हैं!ऐसा भी नहीं कि इन व्यवहारों के विरुद्ध कानून नहीं हैं लेकिन व इतने मजबूत नहीं हैं कि इन घटनाओं को रोक सकें!कभी राजनीति,तो कभी पैसा,शक्ति और भाई-भतीजावाद इस तरह के कानून पर हावी हो जाते हैं! समाज में बढ़ती ऐसी घटनाओं को देखकर लगता नहीं कि इन्हें खत्म करने की कोशिश भी की जा रही है!सिर्फ नारों और विज्ञापनों से समाज की सोच नहीं बदल सकती! इसके लिए नए सिरे से पुरुष सत्तात्मक समाज का समाजीकरण करने की आवश्यकता है!दुख की बात तो यह है कि हम भारतीय समाज में रहकर भी अपनी सभ्यता संस्कृति का मजाक बनाने में हम खुद ही दोषी होते हैं महिलाएं व लड़कियां बदनामी से डरती है उसे लगता है कि समाज में उनका नाम खराब हो जाएगा किसी बड़े घराने या छोटे घर के हो वह कोर्ट कचहरी जाने से डरते हैं या इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहते हैं और इसे आसानी से टाल देते हैं और कहीं ना कहीं यह बात बड़े हादसे को निमंत्रण देने का कारण बन जाता है! लेकिन छेड़छाड़ छोटा मामला नहीं है इससे समाज में बढ़ावा नहीं देना चाहिए क्योंकि आपका मौन बड़े हादसे को निमंत्रण दे सकता है इसीलिए हम सभी को मिलकर इसे दूर करने में सहभागिता दिखानी चाहिए, क्योंकि एक महिला अगर इसका जवाब देने के लिए आगे बढ़ती है तो उनका मनोबल गिराना नहीं चाहिए बल्कि उसका मनोबल बढाकर उसको योगदान देना चाहिए ताकि छेड़छाड़ की घटनाओं पर विराम लग सके!आओ सब मिलकर छेड़छाड़ का विरोध करें और ऐसे दोषियों को सजा दिलाकर बेटियों का मनोबल बढ़ाएं।