मैं मां हूं तेरी राहों के सारे कंकर को चुनती हूं।
मैं मां हूं तेरी राहों के सारे कंकर को चुनती हूं
“समाज की सच्चाई को दर्शाती कविता – [सीमा अली]”
यह कविता सीमा अली, निवासी रतनपुरा द्वारा रचित है, जिसमें आज के परिवेश के समस्या को को बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है।”
आंखों में आंसू लेकर तेरे सपनों को बुनती हूं, मैं मां हूं तेरी राहों के सारे कंकर को चुनती हूं।
जब बाल रूप में जन्म लिया मैं फूली नहीं समाई थी, तू मेरा राजा बेटा है कह कर मैं इतराई थी।
मंदिर में माथा टेका था मस्जिद में दुआ भी मांगी थी, तू स्वस्थ रहे तू मस्त रहे रब से यह अरज लगाई थी।
बन जाएगा अफ़सर एक दिन यह सोचके खूब पढ़ाई थी, तेरे खुशियों के खातिर हर गम से लड़ी लड़ाई थी।

तू पढ़ा लिखा फिर बड़ा हुआ अब तेरी राहें तकती हूँ,
चक्कर में मेरे मत रहना यह बातें मुझको चूभती है।
मुझमें बिन कुछ कर पाते न थे अब मुझसे हर बात छुपाते हो मैं टोका टोकी करती हूं यह कह कर आंख दिखाते हो।
तेरी उससे ही शादी की जो तेरे मन को भाई थी,अब उससे ही गुम रहते हो क्यों भूल गए एक माई थी।
लेखक का विवरण
नाम: सीमा अली
स्थान: रतनपुरा
