सूफ़िया-ए-कराम के अनुसार शबे-बरात: इबादत, तौबा और इंसानियत की रात
सूफ़िया-ए-कराम के अनुसार शबे-बरात: इबादत, तौबा और इंसानियत की रात
शबे-बरात को लेकर सूफ़िया-ए-कराम की तालीम साफ़ और स्पष्ट है। उनके अनुसार यह रात दिखावे, शोर-शराबे या रस्मों की नहीं, बल्कि आत्म-सुधार और अल्लाह की बंदगी की रात है।
सूफ़ी बुज़ुर्गों का मानना है कि शबे-बरात में इंसान को अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होकर सच्ची तौबा करनी चाहिए और अल्लाह से मग़फ़िरत की दुआ करनी चाहिए। इस रात नफ़्ल नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र-ए-इलाही और दरूद शरीफ़ पढ़ने को सबसे बेहतर अमल बताया गया है।
सूफ़िया-ए-कराम शबे-बरात को ख़ामोशी और तन्हाई में इबादत की रात बताते हैं। उनके मुताबिक इस मौके पर आतिशबाज़ी, बेवजह की रौनक या शोर-शराबा करना इस रात की रूह के ख़िलाफ़ है।
सूफ़ी परंपरा में शबे-बरात को माफ़ी और मोहब्बत की रात भी कहा गया है। बुज़ुर्गों की तालीम है कि इंसान इस रात दिल से नफ़रत, हसद और दुश्मनी निकालकर दूसरों को माफ़ करे, तभी उसकी दुआ क़बूल होती है।
इसके साथ ही सूफ़िया-ए-कराम ने ज़ोर दिया है कि इस रात ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद, सदक़ा और खिदमत करना भी बड़ी इबादत है। उनका कहना है कि जिस इबादत से इंसानियत को फ़ायदा न पहुँचे, वह अधूरी है।
सूफ़िया-ए-कराम के अनुसार शबे-बरात का असली मक़सद दिल की इस्लाह, अमल की पाकीज़गी और अल्लाह से अपने रिश्ते को मज़बूत करना है।