ज़िंदगी — पिताजी के साथ और पिताजी के बिना
ज़िंदगी — पिताजी के साथ और पिताजी के बिना
पिताजी के साथ ज़िंदगी कुछ अलग ही होती है…
छोटी-छोटी बातों में मज़ा, छोटी-छोटी परेशानियों में उनका मज़बूत हाथ, और बड़ी-बड़ी उलझनों में उनकी एक मुस्कान जो काफ़ी होती थी सब आसान करने के लिए।
जब पिताजी होते हैं, तब घर भरा-भरा लगता है।
एक साया होता है, जो सामने नहीं दिखता, पर हमेशा हमारे साथ होता है।
हमेशा सोचने वाला कोई होता है, जो अपने से ज़्यादा हमारे बारे में चिंता करता है।
जिसने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ खोया, बस हमें कुछ देने के लिए।
पिताजी के साथ होने का मतलब होता है
जेब में चाहे पैसे न हों, लेकिन मन में कभी डर नहीं होता।
क्योंकि हमें पता होता है कि “पापा हैं ना…”
लेकिन…
जब पिताजी नहीं होते
तो घर वही रहता है, दीवारें वही रहती हैं…
पर उस घर की “रूह” कहीं गुम हो जाती है।
आवाज़ें धीमी हो जाती हैं, हँसी अधूरी लगने लगती है, और सबसे बड़ी बात…
एक अजीब-सी खाली जगह हमेशा महसूस होती है।
अब कोई सुबह चाय पूछने नहीं आता,
कोई रात को दरवाज़ा बंद करने की आवाज़ नहीं आती,
कोई पूछता नहीं “बेटा ठीक से खाना खाया कि नहीं?”
कोई आंखों में झांक कर नहीं कहता “थक गया होगा तू, आराम कर।”
पिताजी के बिना ज़िंदगी…
बस चलती है, पर वैसी नहीं होती।
कभी-कभी लगता है कि वो कहीं नहीं गए,
बस थोड़ी देर को चुप हो गए हैं।
हर काम करते वक़्त लगता है काश, वो ये देख पाते…
हमारी छोटी जीतें भी अब बड़ी नहीं लगती,
क्योंकि पीठ थपथपाने वाला अब साथ नहीं।पर एक बात समझ में आई है पिताजी भले अब हमारे साथ न हों,
पर उनके संस्कार, उनकी बातें, उनकी डाँट, उनका संघर्ष…
हमारी रगों में दौड़ रहा है।
वो हर उस फ़ैसले में हमारे साथ होते हैं
जहाँ हमें मज़बूती से खड़ा रहना होता है।
हर गिरते क़दम के पीछे उनकी सीख खड़ी होती है।
“पिताजी के साथ ज़िंदगी सुकून देती है,
और पिताजी के बिना…
हर कदम जैसे एक इम्तहान बन जाती है…”