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दुबई से लास आने पर गांव मे पसरा मातम

दुबई से लास आने पर गांव मे पसरा मातम

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19 जुलाई जनपद देवरिया खामपार थाना अंतर्गत खबर खामपार बाजार की है जो हर उस शख्स के दिल को छू जाएगी, जिसने अपनों को परदेस भेजा है, या जो खुद परदेस में रहकर अपनों के लिए संघर्ष कर रहा है।

सपनों की नगरी कहे जाने वाले शहर दुबई। यहां अनगिनत युवा इस शहर की चकाचौंध में अपने सुनहरे भविष्य की तलाश में जाते हैं। लेकिन, कभी-कभी इन सपनों का अंजाम इतना दर्दनाक होता है कि कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज एक ऐसा ही दुखद मामला सामने आया है, जहां दुबई में काम कर रहे एक युवक का लास जब उसके गांव पहुंचा, तो खुशियां मातम में बदल गईं।

आपको बता दें कि कुछ महीने पहले किताब अंसारी दुबई गया था जहां उसकी तबीयत खराब हो गई वहीं उसका इलाज चल रहा था लगभगल 3 महीने आईसीयू में  को लेकर कोमा में रहा। नर्गिस खातू इलाज चल रहा अपने शौहर को देखने दुबई गयी जाकर देख वापस भारत आ गयी शायद इसी इंतजार में कि हमारा शौहर ठीक होकर आएंगे।

लेकिन उनके दरवाज़े पर जो दस्तक हुई, वो किसी ज़िंदा इंसान की नहीं, बल्कि एक ताबूत मे बंद जनाजे की रूप में ताबूत खुलते देख घरवाले व रिस्तेदारो की आंखें भर आईं।
भाई शहाबुद्दीन अंसारी अपने छोटे भाई के लाश को रोते बिलखते लखनऊ एयरपोर्ट पर रिसीव कर एंबुलेंस से 5 बजे शाम को अपने गांव खामपार पहुंचे। पहुंचते ही गांव का माहौल मातम में तब्दील हो गया, हर आंख नम थी, और हर कोई यही कह रहा था, “काश! वो ज़िंदा लौटता”। यहां सारी तैयारियां पहले से हो चुकी थी लास आने के बाद गांव के पूरब इदगाह के समीप जनाजे की नमाज के बाद बगल मे स्थित कब्रस्तान में दफन किया गया।

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बताया जा रहा है कि किताबुद्दीन / पुत्र वकील अंसारी अपने परिवार को बेहतर ज़िंदगी देने के लिए दुबई गया था। उसने वहां कड़ी मेहनत की, दिन-रात एक किए, ताकि उसके अपनों को किसी चीज़ की कमी न हो। किताबुद्दीन अंसारी चार भाइयों में सबसे छोटा था। इसके दो पुत्री एक पुत्र है जो लखनऊ में रहकर पढ़ाई करते हैं सबसे बड़ी पुत्री शिब्बी खातून (26) मझला बेटा अमन (19) सबसे छोटी शना (14 ) से पिता का साया हटा कर खुदा ने किताबुद्दीपन की किताब को हमेशा के लिए बंद कर दिया। इसको लेकर पत्नी नरगिस खातून और दोनों बेटियों का रो-रोकर बुरा हाल है।
इस घटना ने एक बार फिर परदेस में काम करने वाले भारतीयों की सुरक्षा और उनके जीवन की चुनौतियों को सामने ला दिया है।यह सिर्फ एक युवक की कहानी नहीं है। यह उन हज़ारों-लाखों परिवारों का दर्द है, जिनके अपने परदेस में हैं। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे कुछ पल में ही खुशियों का महल ढह जाता है, और सपनों की दुनिया अचानक हकीकत की कड़वी सच्चाई से टकरा जाती है। इस दुख की घड़ी में, हम बस यही दुआ कर सकते हैं कि परिवार को इस असहनीय पीड़ा को सहने की शक्ति मिले।

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