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कहा गया चिकित्सा में मानवता,क्या मनुष्य का कोई मोल नहीं

चिकित्सा में मानवता क्यों गुम होती जा रही..

चिकित्सा में मानवता क्यों गुम होती जा रही हैं यह किसी ने नही सोचा और कोई सोचना भी नही चाहता!एक समय था तब मानवता ही सबसे बड़ा धर्म माना जाता था लेकिन अब तो मानवता ही खत्म की ओर हो रही है तो दूसरी ओर चिकित्सक को धरती का भगवान माना जाता है!इस धरती के भगवान की बढ़ती फीस और महंगी दवाइयां आम लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनती जा रही हैं! चिकित्सा खर्च इस कदर जेब पर भारी पड़ रहा है कि हर साल कर्ज लेकर संपत्तियां बेचकर इलाज कराने वाली काफी आबादी गरीबी रेखा से नीचे पहुँच जाती है!कैंसर हृदय और मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों की आधी कमाई इलाज पर खर्च हो जाती है! ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य उप केंद्रों की स्थापना की हुई हैं लेकिन ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र दयनीय हालत में देखें जाते है!हमारा देश जेनेरिक दवाइयों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है लेकिन शायद ही कोई चिकित्सक मरीजों को जेनेरिक दवाइयां लेने की सलाह दे रहा है! चिकित्सक मरीजों को जरूरत से ज्यादा दवाइयां लिख रहे हैं क्योंकि दवाइयों के साथ कमीशन का खेल भी चल रहा है!इलाज के दौरान मरीजों को चिकित्सक के द्वारा बताए गए जांच केंद्रों पर ही जांच करानी पड़ती है अन्यथा दूसरे केंद्रों की जांच रिपोर्ट को आमतौर पर चिकित्सक मान्यता नहीं देते हैं क्योंकि जांच में भी कमीशन का खेल धड़ल्ले से चल रहा है!सरकार को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की दशा सुधारनी चाहिए अन्यथा गरीबों का जीवन दुश्वार हो जाएगा।

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