कांग्रेस का पुराना दांव: 2027 में लौटेगा दलित-मुस्लिम समीकरण या बदलेगा यूपी का सियासी गणित?
कांग्रेस का पुराना दांव: 2027 में लौटेगा दलित-मुस्लिम समीकरण या बदलेगा यूपी का सियासी गणित?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात पर मोहरे तेजी से सजने लगे हैं। कांग्रेस ने अपने प्रदेश संगठन में जिस तरह बड़ा बदलाव किया है, उसने एक सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है—क्या कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है?
2 अक्टूबर को कांग्रेस ने अजय राय की जगह तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया। वहीं सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। इसके अलावा देवेंद्र निषाद और दलित नेता आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया गया।
एक ही संगठनात्मक फेरबदल में ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित और अति पिछड़े समुदायों से जुड़े चेहरों को प्रमुख जिम्मेदारियां मिलना महज संयोग है या 2027 के लिए कांग्रेस के सामाजिक विस्तार की रणनीति?
यही सवाल अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा में है।
कांग्रेस ने चला कौन-सा पत्ता?
कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में कभी व्यापक सामाजिक आधार हुआ करता था। लेकिन मंडल राजनीति के बाद पिछड़े वर्गों की राजनीति के उभार, बहुजन राजनीति के विस्तार और क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के साथ कांग्रेस का पुराना सामाजिक आधार कमजोर होता गया।
अब पार्टी फिर उसी राजनीतिक जमीन को तलाशती दिखाई दे रही है।
आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के साथ पार्टी ने पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच भी एक क्षेत्रीय संतुलन बनाने का संकेत दिया है। मीडिया रिपोर्टों में इस पूरी कवायद को कांग्रेस के सामाजिक और क्षेत्रीय आधार को फिर से विस्तार देने की कोशिश के तौर पर देखा गया है।
लेकिन सवाल सिर्फ चेहरों का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या इन चेहरों के जरिए कांग्रेस उन मतदाताओं तक दोबारा पहुंच पाएगी, जो कभी उसके राजनीतिक आधार का हिस्सा माने जाते थे?
मुस्लिम वोट पर सपा की पकड़ को चुनौती?
उत्तर प्रदेश की विपक्षी राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं को लेकर समाजवादी पार्टी का प्रभाव लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा गठबंधन ने साथ चुनाव लड़ा था। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इमरान मसूद को प्रदेश संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिलने से कांग्रेस की मुस्लिम राजनीतिक पहुंच को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
मीडिया रिपोर्टों में इसे सपा के साथ सीट बंटवारे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की भूमिका के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि सपा की ओर से यह संकेत भी दिया गया है कि केवल संगठनात्मक नियुक्ति से सीट बंटवारे का फैसला तय नहीं होता।
यानी असली सवाल अभी बाकी है—
क्या कांग्रेस गठबंधन के भीतर रहकर अपनी जमीन बढ़ाएगी या अपने दम पर राजनीतिक विस्तार की कोशिश करेगी?
दलित राजनीति में भी कांग्रेस की नजर?
कांग्रेस के नए संगठन में दलित चेहरे को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिया जाना भी राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय है।
दलित राजनीति में लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव रहा है। वहीं भाजपा और सपा भी अलग-अलग सामाजिक समूहों के जरिए दलित मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश करती रही हैं।
ऐसे में कांग्रेस अगर दलित और मुस्लिम दोनों सामाजिक समूहों के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करती है, तो विपक्षी राजनीति के भीतर ही एक नई प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है।
लेकिन यहां भी सवाल बड़ा है—
क्या केवल संगठन में प्रतिनिधित्व देने से वोट का राजनीतिक रुझान बदल जाता है?
इसका जवाब चुनावी मैदान में संगठन की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता से ही सामने आएगा।
सपा-बसपा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है कांग्रेस का यह कदम?
अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपना संगठन मजबूत करती है और दलित-मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाती है, तो इसका असर केवल कांग्रेस की सीटों पर नहीं, बल्कि विपक्षी वोटों के वितरण पर भी पड़ सकता है।
मुस्लिम मतदाताओं के बीच कांग्रेस की सक्रियता सपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल खड़े कर सकती है।
दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस की पहुंच बढ़ती है तो बसपा के सामने भी अपनी राजनीतिक जमीन को लेकर नई चुनौती हो सकती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सक्रियता बढ़ती है तो वहां के क्षेत्रीय सामाजिक समीकरणों पर भी उसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
यानी कांग्रेस का सवाल सिर्फ कांग्रेस का सवाल नहीं रह गया है।
भाजपा के खिलाफ विपक्षी गणित भी बदल सकता है?
उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का सबसे बड़ा सवाल भाजपा के खिलाफ वोटों के बंटवारे का भी है।
अगर कांग्रेस, सपा और बसपा अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करते हैं, तो विपक्षी वोटों का वितरण किस दिशा में जाएगा—यह 2027 के चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।
लेकिन यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि संगठनात्मक बदलाव सीधे वोट में बदल जाएंगे।
चुनाव में उम्मीदवार कौन होंगे?
गठबंधन किस रूप में बनेगा?
कितनी सीटों पर कौन लड़ेगा?
स्थानीय स्तर पर संगठन कितना सक्रिय होगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—मतदाता किस मुद्दे पर मतदान करेगा?
इन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सामाजिक समीकरण बनाना नहीं, बल्कि उसे बूथ तक पहुंचाना होगी।
लखनऊ में बैठकर बनाए गए सामाजिक समीकरण और गांव-कस्बे की चुनावी जमीन के बीच बड़ा अंतर होता है।
किस विधानसभा में कांग्रेस का सक्रिय संगठन है?
कहां मजबूत स्थानीय चेहरा है?
कहां बूथ कमेटियां सक्रिय हैं?
कहां पुराने कार्यकर्ता वापस लौटे हैं?
और कहां पार्टी सिर्फ चुनाव के समय दिखाई देती है?
2027 में कांग्रेस की असली परीक्षा इन्हीं सवालों पर होगी।
पुराना सामाजिक समीकरण, नई राजनीतिक चुनौती
कांग्रेस जिस सामाजिक आधार की ओर लौटने की कोशिश करती दिखाई दे रही है, वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी उसकी बड़ी ताकत रहा है।
लेकिन आज की राजनीति 1980 के दशक वाली राजनीति नहीं है।
आज मतदाता के सामने भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस और अलग-अलग क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प मौजूद हैं। सोशल मीडिया, स्थानीय मुद्दे, जातीय प्रतिनिधित्व, सरकारी योजनाएं और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
इसलिए केवल सवर्ण-दलित-मुस्लिम समीकरण की चर्चा से चुनाव का पूरा गणित समझना संभव नहीं होगा।
2027 में असली सवाल यही होगा
कांग्रेस ने संगठन में बदलाव करके अपना संदेश जरूर दे दिया है।
अब गेंद जमीन पर है।
क्या आराधना मिश्रा का नेतृत्व कांग्रेस के पुराने सवर्ण आधार को जोड़ पाएगा?
क्या इमरान मसूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की मुस्लिम पहुंच बढ़ा पाएंगे?
क्या आलोक प्रसाद जैसे दलित चेहरे कांग्रेस को दलित समाज में नई राजनीतिक जगह दिला पाएंगे?
क्या देवेंद्र निषाद के जरिए अति पिछड़े वर्गों तक पहुंच मजबूत होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या कांग्रेस इन सामाजिक समूहों को सिर्फ चुनावी समीकरण में जोड़ना चाहती है या एक स्थायी राजनीतिक गठजोड़ तैयार करने की कोशिश कर रही है?
2027 के चुनाव में इसका जवाब सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि बूथों पर दिखाई देगा।
कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपना संगठन बदल दिया है।
अब देखना यह है कि क्या बदले हुए चेहरे कांग्रेस की बदली हुई राजनीतिक तस्वीर भी बना पाते हैं, या 2027 की चुनावी बिसात पर यह दांव भी सिर्फ चर्चा बनकर रह जाता है?